धर्म का सार
धर्म का सार अत्यन्त सूक्ष्म है। यह युक्ति मुक्ति प्रदान करने वाला ओर समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। धर्म अपने सामान्य एवं विशेष इन दो रूपों में विकसित होता है। विशेष धर्म की स्थिति भी सामान्य धर्म के आश्रय से ही होती है। अर्थात् सामान्य धर्म के बिना विशेष धर्म की स्थिति असम्भव है ओर विशेष धर्म के बिना सामान्य धर्म की चर्चा करना अशक्य है।
गरुड पुराण के प्रथम खण्ड में सामान्य धर्म का वर्णन करते हुए कहा गया है कि-
अर्हिसा सूनृता वाणी, सत्यशोचे क्षमा दया।
वर्णिनालिंगिना चैव सामान्यो धर्म उच्यते।। -गरुडपुराण १९५।२२; श्रीमदभागवत पुराण १९।९७।२९; अग्निपुराण ९४।९०
प्रमुख पुराणों में इन समस्त मानवीय गुणों के आचरण हेतु मानव को सुहदसम्मित शैली से प्रोत्साहित किया जाता है। “धर्म एवापवर्गाय" कहकर कूर्म पुराण में उसे मोक्ष के हेतु रूप मे प्रस्तुत किया गया है! साधारण धर्म के अंगों की चर्चा वामन पुराण में इस रूप में प्राप्त होती है-
तपः अहिंसा च सत्यं च शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
दया दानं त्वनृशंस्यं शुश्रूषा यज्ञ कर्मं च।। -वामनपुराण ७५।९११
ये धर्म मानव व्यवहार के नियन्त्रक है सामान्यतः व्यक्ति की प्रवृत्ति परलोक परायण होती है। तप, अहिंसा, सत्य आदि इन सामान्य धर्मों का वर्णन उनका स्वरूप निम्न शीर्षकों के परिप्रेक्ष्य में दृष्टव्य है-
अहिंसा
समस्त प्राणियों में मानव शक्तिसम्पन्न प्राणी है। वही अपने से निम्न शक्तिहीन प्राणी अौर जीव जन्तुओं का संरक्षक है। महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णित है कि “अहिंसा परमोधर्मः" अर्थात् अहिंसा ही परम है। “अहिंसादि ममः प्रोक्तः" कहकर गरुड पुराण में अहिंसा को मम कहा गया है। जो मोक्ष का साधनभूत है। इसी अहिंसा को विद्वज्जन सत्पुरुष योग परम सिद्धि प्रदान करने वाली कहते है। इस प्रकार अहिंसा एक मानवीय गुण है जिसके आधार पर ही वर्तमान समय में विश्व शान्ति का स्वरूप निर्मित किया जा रहा है। अहिंसा धर्म के साथ-साथ शान्ति की भी प्रतिस्थिति है। अतः सामान्य धर्म के परिग्क्ष्य मेँ अहिंसा निस्सन्देह सर्वोपरि है।
सत्य
सत्य धर्मवृद्ध का साधन है। इसी से मानव का आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक विकास होता है। ब्रह्मपुराण मेँ सत्य को स्वर्गं का द्वार कहा गया है। जो कुछ भी देखा सुना अनुभव अथवा अनुमान के द्वारा प्रकट ग्रहण किया गया, उसका यथार्थ कथन कर देना सत्य है, लेकिन यह सत्य पराई पीड़ा से रहित होना चाहिए। अन्यत्र भी इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा गया है
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्।
प्रिय च नानृतं न ब्रूयादेषः धर्मः सनातनः।।
इस जगत् में सत्य में ही सम्पूर्णं भाव प्रतिष्ठित है। द्विजातियों ने सत्य ही कहा है-
सत्येन वर्तमाप्नोति, सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्।
यथार्थकथनाचारः सत्यं प्रोक्तं द्विजातिभिः।।
वस्तुतः सत्य एक एेसा ज्योति स्तम्भ है जिसका प्रकाश मानव मन को आलोकित करता है। परिस्थिति के प्रतिकूल मन को आलोकित करता है। परिस्थिति के प्रतिकूल होने पर सत्य कीं परीक्षा होती है। सत्य प्रतिज्ञ स्वयं को समर्पित करके भी सत्य की रक्षा के त्रत को पूरा करते है। अतः मौन उत्तम है किन्तु मिथ्यावचन बोलना अनुचित है-
वरं मौनं कार्य न च वचनमुक्तं यदनृतम्।-वामनपुराण ५९।२८
अस्तेय
अन्याय, छलकपट या चोरी से पराया वस्तु का अपहरण करना स्तेय है। इसके वशीभूत हुआ मानव वस्तुओं के लोभ में फसा चला जाता है। बुद्धि के कलुषित हो जाने पर मनुष्य की अधोगति निश्चित है। इस दुर्गुण का न होना ही अस्तेय कहलाता है। स्कन्द पुराण के द्वितीय खण्ड गे वर्णित है कि- परस्वहरणं चौर्य सर्वदा सर्वमानुषैः।
अर्थात् पराये धन का अपहरण करना चोर कर्म है। अतः मनुष्यो को सर्वदा तथा विशेष रूप त इसका वर्णन कर देना चाहिए। मन, वचन तथा कर्म के पराये धन से दूर रहना अस्तेय का पोषक है। यह धर्म का ही एक अंग है-
परस्वं नैव हर्तव्यं परजाया तथेव चय।
मनोभिर्वचनैः कार्येमन एवं प्रकारयेत्।। -पद्मपुराण ३३।२६
अपरिग्रह
अपरिग्रह का अभिप्राय है किसी भी वस्तु का संचय न करना। पुराणों मे अनेक स्थलों पर संचय की इस प्रवृत्ति का विरोध किया गया है। श्रीमद्भागवत पुराण मे कहा गया है कि-
सायन्तनं श्वस्तनं वा न सङ्गृहीतं भिक्षितम्, पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकेव न संगृही।
सायन्तनं श्वस्तनं वा न सङ्गृहीत भिक्षुकः, माक्षिकाडइव संगृहन्सह तेन॒ विनश्यति।। -श्रीमद्भागवतपुराण ९९।८।११-९२
क्षमा
पुराणों में क्षमा को निर्बलों के लिए महान बल ओर बलवानों के लिए महान आभूषण कहा है। एेसा महापुरुष जो अपनी सहिष्णुता से इस लोक ओर परलोक मेँ सुखो का उपयोग करने वाला हाता है।
सहिष्णु स्यात्सधर्मात्मा न ही रागं प्रयाति च।
समरनाति परं सौष्यमिहं चामुत्रवापि च।। -पदमपुराण ३३।२०
क्षमा एक एेसा गुण है जिसके द्वारा राजा लोग समस्त को धारण करता है। क्षमा पृथ्वी का गुण है अतः राजा को पार्थिव कहा जाता है-
क्षमया धारयेल्लोकान्पार्थिवः पार्धिवो भवेत्।
उत्साहमन्त्रशक््याद्यै रक्षेद्यस्याद्धरिस्ततः।। -अग्निपुराण ८९।२०
शौच
यह शरीर अशौच का परम स्थान है। व्यक्ति व्यामोहित होने के कारण अपने देह की दूषित गन्ध से विरक्त नहीं होता। यह सम्पूर्ण जगत् पवित्र है केवल यह शरीर ही परम अशुचि होता है।
शौचं तु द्विविधं प्रोक्तं बाह्याभ्यन्तरं तथा। -अग्निपुराण ९८३।९७
इसी भाव को कूर्म पुराण इस प्रकार व्यक्त करता है-
बाह्याभ्यन्तरं शौचं द्विधा प्रोक्तं द्विजोत्तमा।
मृज्जलाभ्यां स्मृतं वाह्यं मनः शुद्धि स्थान्तरम्। -कूर्मपुराण १९।२८
धृति
सामान्य धर्म मेँ “धैर्य" अपने प्रभावी रूप में मनुव्यो को अभिभूत करता है। धैर्यशाली व्यक्ति विभिन आपदाओं को ईश्वर प्रदत्त मानकर सहजता से स्वीकार कर लेता है। जहाँ धैर्य होता है वहीं लक्ष्मी आती है। ओर जहाँ लक्ष्मी होती हैँ वहाँ धर्म, ओर जहाँ धर्म होता है वहीं विजय होती है।
दम
दमन को ही दम कहा जाता है। इन्द्रियां जो अपने-अपने विषयों को भेजने के लिए निरन्तर आकर्षित रहती हैँ। इन पर नियन्त्रण करना ही दम है।
दमस्तेजो वर्धयति पवित्रो दम उत्तमः। -पदयपुराण १२।९७
इन्द्रिय निग्रह
इन्द्रिय निग्रह ही सर्वश्रेष्ठ है। जिसका मन शान्त है। उसे दान आदि कमों की भी कोई आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत जो भी पुरुष इन्द्रिय को वश मेँ करके दोष प्राप्ति के समस्त साधनों का त्याग करता है, उसके धर्म, अर्थ, काम का निरञ्च मात्र भी क्षय नहीं होता-
दोष हैतुमशेषाश्च वश्यात्मा यो निरस्यति।
तस्य धर्मार्थे कामानां हानिर्नाल्पापिजायते।। -विष्णुपुराण, तृतीय अंश ९२।४०
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